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काफिर के साथ खा गया जो मुसलमान था …………..KAVI DEEPAK SHARMA

अप्रैल 26, 2009

Kavi Deepak Sharmaजिस पर मुझे ज़रूरत से ज्यादा गुमान था
दिल उस शख्स का बहुत बेईमान था

बिखरा हुआ पड़ा था एक साया उसके पास
कोई अजनबी नही वो मेरा अरमान था

कहकहों में बज्म के दब गई सिसकी मेरी
मामूली थी हस्ती मेरी,बहुत छोटा निशान था

खुश था जिसे में फूंक कर मज़हबी जुनून में
बाद में मालूम हुआ वो मेरा मकान था

दोस्तों ने दोस्ती निभाई भी तो किस जगह
बस ज़िन्दगी से चार कदम शमशान था

भूख का कहीं कोई मज़हब ‘ दीपक’ होता नही
काफिर के साथ खा गया जो मुसलमान था ।

( उपरोक्त ग़ज़ल काव्य संकलन मंज़र से ली गई है )

@Kavi Deepak Sharma
http://www.kavideepaksharma.co.in