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वीरों ने अपना खून बहाकर नीव रखी आज़ादी की।

मार्च 23, 2019

वीरों ने अपना खून बहाकर नीव रखी आज़ादी की।
हमने उस कुरबानी की अब लगता है बरबादी की।।

देश को खुल्लमखुल्ला देखो खुली चुनौती देते हैं।
बाँट रही है हमें सियासत पहन पोशाकें खादी की।।

बना शगूफा वंदेमातरम, जन गण मन पर शोर शराबा।
मुल्क़ से ऊपर रखते मज़हब, पैरवी आंतकवादी की ।।

राजगुरू,सुखदेव विसराये,भगत सिंह इतिहास हुऐ।
रुतबेदार बन गये लफंगे इज़्ज़त करें आंतकवादी की।

हिन्द की ख़ातिर चूमा फन्दा,सतलुज के मुहाने पर ।
मौत बना ली अपनी दुल्हन,खुद पहन के फंदा शादी की।

“दीपक” इससे बुरा वक्त क्या हिन्दुस्तान क्या देखेगा।
राम कृष्ण की जन्मस्थली को ही कहते ज़मीं गाज़ी की।।
@दीपक शर्मा

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मैं न हिंदू हूँ ,न सिक्ख हूँ, न तो मुसलमान हूँ—–Kavi Deepak Sharma

मार्च 19, 2019

मैं न हिंदू हूँ ,न सिक्ख हूँ, न तो मुसलमान हूँ।
कोई मजहब नहीं मेरा, फ़क़त एक इन्सान हूँ।

मुझे क्यूँ बांटते हो क़ौमों में, ज़ुबानों में।
मैं सिर से पावँ तलक सिर्फ़ हिंदुस्तान हूँ।।

वक़्त की निगहबानी में दुनिया पला करती है।
तू भी मेहमान है और मैं भी एक मेहमान हूँ।।

तेरी नज़र में राह का मैं एक दरख़्त सही।
मगर न जाने कई परिंदों का घर मकान हूँ ।

ज़म्हुरिअत अदना को बादशाह बना देती है।
ज़र्रा भी चीख़ कर कहता है मैं आसमान हूँ ।।

पहले वतन पे रख ईमान फिर ये दावा करना।
मैं एक हिन्दू हूँ , सिख हूँ,या मुसलमान हूँ।।

जला जो मंदिर में तो आरती हो गया “दीपक”
बला मज्जिद में तो बोला कि मैं अजान हूँ।
@ दीपक शर्मा
http://www.kavideepaksharma.com
मैं न हिंदू हूँ ,न सिक्ख हूँ, न तो मुसलमान हूँ।

इसका असली हक़दार तो केवल मजदूर है……कवि दीपक शर्मा

मई 3, 2009

गगन को चूमते ऊंचे मकान वालों सुनो
बहुत दिलकश , मुन्नकश ऐवान वालों सुनो
तुम्हें क्यों अपनी इमारत पे गुरुर है
इसका असली मालिक तो केवल मजदूर है

इनकी हकदार रोते बच्चों की निगाहें है
इनकी हक़दार पत्थर तोड़ती बेबस माँऐं हैं
इनके हक़दार घायल हाथ , ज़ख्मी पाँव हैं
इनके हक़दार तो बहते- रिसते घाव हैं
तन तुम्हारा तो ऐसी चोटों से दूर है
इसका असली हक़दार तो केवल मजदूर है

कितने मजदूरों ने छोड़कर बीमार बच्चों को
सूरत इन महलों की अपने हाथों से संवारी है
दबा कर भूख के शोले एक लोटा पानी से
इनके दरवाजों पर लाजवाब नक्काशी उभारी है
तुने तो सिक्कों की रौशनी फेंकी पसीने पर
मगर मजदूर की मेहनत ने तराशा कोहिनूर है

चमकते फर्श पर तुम जो खड़े हो इतराये से
कई हाथों ने इसे प्यार से सहलाया है
हर टुकडा लगाया है बहुत करीने से
बड़े सलीके से दुल्हन – सा इसे सजाया है
आज उनको ही नहीं इजाजत दहलीज़ चड़ने की
जिनके हुनर की बदौलत ड्योढी तेरी नूर है
@कवि दीपक शर्मा
Nazm taken from his Collection”Manzar”
http://www.kavideepaksharma.co.in
http://shayardeepaksharma.blogspot.comlabour-day1