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इसका असली हक़दार तो केवल मजदूर है……कवि दीपक शर्मा

मई 3, 2009

गगन को चूमते ऊंचे मकान वालों सुनो
बहुत दिलकश , मुन्नकश ऐवान वालों सुनो
तुम्हें क्यों अपनी इमारत पे गुरुर है
इसका असली मालिक तो केवल मजदूर है

इनकी हकदार रोते बच्चों की निगाहें है
इनकी हक़दार पत्थर तोड़ती बेबस माँऐं हैं
इनके हक़दार घायल हाथ , ज़ख्मी पाँव हैं
इनके हक़दार तो बहते- रिसते घाव हैं
तन तुम्हारा तो ऐसी चोटों से दूर है
इसका असली हक़दार तो केवल मजदूर है

कितने मजदूरों ने छोड़कर बीमार बच्चों को
सूरत इन महलों की अपने हाथों से संवारी है
दबा कर भूख के शोले एक लोटा पानी से
इनके दरवाजों पर लाजवाब नक्काशी उभारी है
तुने तो सिक्कों की रौशनी फेंकी पसीने पर
मगर मजदूर की मेहनत ने तराशा कोहिनूर है

चमकते फर्श पर तुम जो खड़े हो इतराये से
कई हाथों ने इसे प्यार से सहलाया है
हर टुकडा लगाया है बहुत करीने से
बड़े सलीके से दुल्हन – सा इसे सजाया है
आज उनको ही नहीं इजाजत दहलीज़ चड़ने की
जिनके हुनर की बदौलत ड्योढी तेरी नूर है
@कवि दीपक शर्मा
Nazm taken from his Collection”Manzar”
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