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चैन-ओ-अमन से जीना ईद के मायने ………….Kavi Deepak Sharma

अप्रैल 26, 2009

Kavi Deepak Sharmaदिल में जब तक मैं-तू नहीं हम हैं
घर बिखरने के मौके बहुत कम हैं .

कौन खींचेगा भला सेहन में दीवार
प्यार जिंदा हो तो फिर कैसा गम है .

जिस्म की छोडिये बिकने लगी औलादे
तरक्की की राह में यह कैसा ख़म है .

खामियां आज उसकी खूबियाँ हो गई
जेब चाक़ थीं पहले अब खूब दम है .

कतरने चन्द बन गईं औरत का लिबास
तहजीब शर्मिंदा है,शर्म के घर मातम है .

ज़ख्म फिर से सभी जवान होने लगे
बता चारागर तेरा ये कैसा मरहम हैं .

माँ की हंसी संग देखा एक हँसता बच्चा
वाह अल्लाह कितनी सुरीली सरगम हैं .

खेलिए वक़्त से मत खेलने दीजिये इसे
वक़्त का खेल दोस्त बहुत बे- रहम हैं .

चैन-ओ-अमन से जीना ईद के मायने
ज़िन्दगी रोकर बसर करना मोहर्रम है.

हाथ फेला के संवारेगा वतन का मुक्कदर
उनको यकीन है पर हमें उम्मीद कम है.

राम ही जाने अब सफ़र का अंजाम “दीपक”
टूटती साँसे रहनुमा की और तबियत नम है .
@Kavi Deepak Sharma
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काफिर के साथ खा गया जो मुसलमान था …………..KAVI DEEPAK SHARMA

अप्रैल 26, 2009

Kavi Deepak Sharmaजिस पर मुझे ज़रूरत से ज्यादा गुमान था
दिल उस शख्स का बहुत बेईमान था

बिखरा हुआ पड़ा था एक साया उसके पास
कोई अजनबी नही वो मेरा अरमान था

कहकहों में बज्म के दब गई सिसकी मेरी
मामूली थी हस्ती मेरी,बहुत छोटा निशान था

खुश था जिसे में फूंक कर मज़हबी जुनून में
बाद में मालूम हुआ वो मेरा मकान था

दोस्तों ने दोस्ती निभाई भी तो किस जगह
बस ज़िन्दगी से चार कदम शमशान था

भूख का कहीं कोई मज़हब ‘ दीपक’ होता नही
काफिर के साथ खा गया जो मुसलमान था ।

( उपरोक्त ग़ज़ल काव्य संकलन मंज़र से ली गई है )

@Kavi Deepak Sharma
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सबका भला कर, प्रभु सबका भला कर……………Kavi Deepak Sharma

अप्रैल 26, 2009
एक साठ वर्षीय नेत्रहीन व्यक्ति,
जो शायद रास्ता भूल गया था,
एक सुनसान सड़क पर अकेला चला जा रहा था ।
राह में खड़ी एक दीवार पर छड़ी लगाकर बोला
क्या आस-पास कोई है?
पास में उपस्थित नारी ने कहा- बाबा कहाँ जाना है?
नेत्रहीन बोला- बेटी गली नम्बर सात का रास्ता बता दो,
अगर हो सके तो मोड़ तक ही पहुँचा दो।
तभी पास की मस्जिद पे खड़े व्यक्ति की
इस वाकिये पे पैनी नजर पड़ी
वह व्यक्ति चिल्लाया – काफिर मुस्लिम लड़की छेड़ता है
अकेला देखकर रास्ता रोकता है।
बस ज़रा से देर में सड़कें खून से लाल थीं,
शहर में देखते ही गोली मरने के आदेश थे।
क्योंकि शहर में मज़हबी तूफान उठ चुका था,
भावनाओं का कौम से गला घुट चुका था।
मन्दिर तोड़े जा रहे थे, मस्जिदें उखाड़ी जा रही थीं,
इंसानों द्वारा इंसान की शक्लें बिगाड़ी जा रहीं थीं।
दोनों धर्मों की अलग- अलग सभाएं हो रहीं थी
किसको मरना है की चालें नियोजित हो रहीं थी
उस नेता का घर तो दौलत से तालाब हो गया था
पर लथपथ लाशों को गिनना बेहिसाब हो गया था।

हर तरफ से जख्मियों की कराह आ रही थी,
उनमें से उस नेत्रहीन की भी सदा आ रही थी,
वह दुआ थी, शिकायत थी, या शुक्रिया था
शोर में ये तो समझ नहीं आ रहा था
पर बार- बार वो यही कहे जा रहा था।
अच्छा हुआ भगवान जो तूने मुझे आँखें नहीं दी,
इससे अच्छा तो ये होता की कान भी न देता,
ताकि मैं, भावनाओं की कराहें तो न सुन पाता
बेवजह मरने वालों की आहें तो न सुन पाता
अंत में दोनों हाथों को मिलाकर, वो बोला चिल्लाकर
सबका भला कर, प्रभु सबका भला कर।

@Kavi Deepak  Sharma

जो रोज़ चलती रही जि़स्म पर गोलियाँ…………….Kavi Deepak Sharma

अप्रैल 26, 2009

जो रोज़ चलती रही जि़स्म पर गोलियाँ
और  मनती रही  खून  की  होलियाँ
तो एक दिन हकीकत हम  भूल जायेंगे
होली और दिवाली   से  भी घबराएँगे ।

हो न पायेगी पहचान रंग और खून में
जो पानी – सा लहू यूं ही बहता रहा
अपनी परछाई भी खौफ देगी एक दिन
अगर दौर कत्ल का यूँ ही चलता रहा ।
जो छूटते  रहे उपद्रवी स्वार्थ पर
फ़र्ज़ लगता रहा स्नेह के दाँव पर
तो और कुछ तो अंजाम होगा नही
बस शवों के कफ़न कम पड़ जायेंगे

अब बातों से कुछ भी न हो पायेगा
न बुझे दीपो की ज्योति लौट पाएगी
तुम कहोगे शान्ति गर बारूद के शोर में
तो ज़र्रों में शान्ति ख़ुद बिखर जायेगी
अरे ! उग्रवाद के कदम रोको ज़रा जोर से 
नहीं तो ख़ुद ही के कदम थर्रा जायेंगे
नासूर नश्तर के हाथों मिटा तो ठीक
वरना हिस्से जि़स्म से अलग हो जायेंगे ।
@कवि दीपक शर्मा,

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( उपरोक्त कविता काव्य संकलन मंज़र से ली गई है )