Archive for the ‘Uncategorized’ Category

Mother’s Day…………By Kavi Deepak Sharma

मई 10, 2009

आओ ! सब मिलकर अपनी जननी के पुनः चरण स्पर्श करें और प्रभू से विनती करें कि हे !परम पिता हमे हर जन्म मे इसी माँ कि कोख से पैदा करना ..हमारा जीवन इसी गोद मे सार्थक हैं. हमारा बचपन इसी ममता का प्यासा हैं और जन्मो -जन्मान्तर तक हम इसी ममत्व का नेह्पान करते रहें ..माँ आप हमारा प्रणाम स्वीकार करो और हमे आशीर्वाद दो .
“उसकी आवाज़ बता देती हैं मैं कहाँ हूँ ग़लत
मेरी माँ के समझाने की कुछ अदा निराली है .”
copy right @ कवि दीपक शर्मा
Kavi Deepak Sharma
http://www.kavideepaksharma.co.inMother's Day

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इसका असली हक़दार तो केवल मजदूर है……कवि दीपक शर्मा

मई 3, 2009

गगन को चूमते ऊंचे मकान वालों सुनो
बहुत दिलकश , मुन्नकश ऐवान वालों सुनो
तुम्हें क्यों अपनी इमारत पे गुरुर है
इसका असली मालिक तो केवल मजदूर है

इनकी हकदार रोते बच्चों की निगाहें है
इनकी हक़दार पत्थर तोड़ती बेबस माँऐं हैं
इनके हक़दार घायल हाथ , ज़ख्मी पाँव हैं
इनके हक़दार तो बहते- रिसते घाव हैं
तन तुम्हारा तो ऐसी चोटों से दूर है
इसका असली हक़दार तो केवल मजदूर है

कितने मजदूरों ने छोड़कर बीमार बच्चों को
सूरत इन महलों की अपने हाथों से संवारी है
दबा कर भूख के शोले एक लोटा पानी से
इनके दरवाजों पर लाजवाब नक्काशी उभारी है
तुने तो सिक्कों की रौशनी फेंकी पसीने पर
मगर मजदूर की मेहनत ने तराशा कोहिनूर है

चमकते फर्श पर तुम जो खड़े हो इतराये से
कई हाथों ने इसे प्यार से सहलाया है
हर टुकडा लगाया है बहुत करीने से
बड़े सलीके से दुल्हन – सा इसे सजाया है
आज उनको ही नहीं इजाजत दहलीज़ चड़ने की
जिनके हुनर की बदौलत ड्योढी तेरी नूर है
@कवि दीपक शर्मा
Nazm taken from his Collection”Manzar”
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चैन-ओ-अमन से जीना ईद के मायने ………….Kavi Deepak Sharma

अप्रैल 26, 2009

Kavi Deepak Sharmaदिल में जब तक मैं-तू नहीं हम हैं
घर बिखरने के मौके बहुत कम हैं .

कौन खींचेगा भला सेहन में दीवार
प्यार जिंदा हो तो फिर कैसा गम है .

जिस्म की छोडिये बिकने लगी औलादे
तरक्की की राह में यह कैसा ख़म है .

खामियां आज उसकी खूबियाँ हो गई
जेब चाक़ थीं पहले अब खूब दम है .

कतरने चन्द बन गईं औरत का लिबास
तहजीब शर्मिंदा है,शर्म के घर मातम है .

ज़ख्म फिर से सभी जवान होने लगे
बता चारागर तेरा ये कैसा मरहम हैं .

माँ की हंसी संग देखा एक हँसता बच्चा
वाह अल्लाह कितनी सुरीली सरगम हैं .

खेलिए वक़्त से मत खेलने दीजिये इसे
वक़्त का खेल दोस्त बहुत बे- रहम हैं .

चैन-ओ-अमन से जीना ईद के मायने
ज़िन्दगी रोकर बसर करना मोहर्रम है.

हाथ फेला के संवारेगा वतन का मुक्कदर
उनको यकीन है पर हमें उम्मीद कम है.

राम ही जाने अब सफ़र का अंजाम “दीपक”
टूटती साँसे रहनुमा की और तबियत नम है .
@Kavi Deepak Sharma
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काफिर के साथ खा गया जो मुसलमान था …………..KAVI DEEPAK SHARMA

अप्रैल 26, 2009

Kavi Deepak Sharmaजिस पर मुझे ज़रूरत से ज्यादा गुमान था
दिल उस शख्स का बहुत बेईमान था

बिखरा हुआ पड़ा था एक साया उसके पास
कोई अजनबी नही वो मेरा अरमान था

कहकहों में बज्म के दब गई सिसकी मेरी
मामूली थी हस्ती मेरी,बहुत छोटा निशान था

खुश था जिसे में फूंक कर मज़हबी जुनून में
बाद में मालूम हुआ वो मेरा मकान था

दोस्तों ने दोस्ती निभाई भी तो किस जगह
बस ज़िन्दगी से चार कदम शमशान था

भूख का कहीं कोई मज़हब ‘ दीपक’ होता नही
काफिर के साथ खा गया जो मुसलमान था ।

( उपरोक्त ग़ज़ल काव्य संकलन मंज़र से ली गई है )

@Kavi Deepak Sharma
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सबका भला कर, प्रभु सबका भला कर……………Kavi Deepak Sharma

अप्रैल 26, 2009
एक साठ वर्षीय नेत्रहीन व्यक्ति,
जो शायद रास्ता भूल गया था,
एक सुनसान सड़क पर अकेला चला जा रहा था ।
राह में खड़ी एक दीवार पर छड़ी लगाकर बोला
क्या आस-पास कोई है?
पास में उपस्थित नारी ने कहा- बाबा कहाँ जाना है?
नेत्रहीन बोला- बेटी गली नम्बर सात का रास्ता बता दो,
अगर हो सके तो मोड़ तक ही पहुँचा दो।
तभी पास की मस्जिद पे खड़े व्यक्ति की
इस वाकिये पे पैनी नजर पड़ी
वह व्यक्ति चिल्लाया – काफिर मुस्लिम लड़की छेड़ता है
अकेला देखकर रास्ता रोकता है।
बस ज़रा से देर में सड़कें खून से लाल थीं,
शहर में देखते ही गोली मरने के आदेश थे।
क्योंकि शहर में मज़हबी तूफान उठ चुका था,
भावनाओं का कौम से गला घुट चुका था।
मन्दिर तोड़े जा रहे थे, मस्जिदें उखाड़ी जा रही थीं,
इंसानों द्वारा इंसान की शक्लें बिगाड़ी जा रहीं थीं।
दोनों धर्मों की अलग- अलग सभाएं हो रहीं थी
किसको मरना है की चालें नियोजित हो रहीं थी
उस नेता का घर तो दौलत से तालाब हो गया था
पर लथपथ लाशों को गिनना बेहिसाब हो गया था।

हर तरफ से जख्मियों की कराह आ रही थी,
उनमें से उस नेत्रहीन की भी सदा आ रही थी,
वह दुआ थी, शिकायत थी, या शुक्रिया था
शोर में ये तो समझ नहीं आ रहा था
पर बार- बार वो यही कहे जा रहा था।
अच्छा हुआ भगवान जो तूने मुझे आँखें नहीं दी,
इससे अच्छा तो ये होता की कान भी न देता,
ताकि मैं, भावनाओं की कराहें तो न सुन पाता
बेवजह मरने वालों की आहें तो न सुन पाता
अंत में दोनों हाथों को मिलाकर, वो बोला चिल्लाकर
सबका भला कर, प्रभु सबका भला कर।

@Kavi Deepak  Sharma

झूठ कहते हैं तो मुज़रिम करार देते हैं………Shayar Deepak Sharma

अप्रैल 26, 2009

Deepak Sharmaजब भी कोई बात डंके पे कही जाती है
न जाने क्यों ज़माने को अख़र जाती है ।

झूठ कहते हैं तो मुज़रिम करार देते हैं
सच कहते हैं तो बगा़वत कि बू आती है ।

फर्क कुछ भी नहीं अमीरी और ग़रीबी में
अमीरी रोती है ग़रीबी मुस्कुराती है ।

अम्मा ! मुझे चाँद नही बस एक रोटी चाहिऐ
बिटिया ग़रीब की रह – रहकर बुदबुदाती है

‘दीपक’ सो गई फुटपाथ पर थककर मेहनत
इधर नींद कि खा़तिर हवेली छ्टपटाती है ।

@Kavi Deepak Sharma
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Jo aaj udit surya hai , kal dhalna hai………Kavi Deepak Sharma

अप्रैल 26, 2009

deepakshDaal kar kuch neer ki bunde adhar mein
Kar akela hi vida agyat safar mein
Kuch neh mishrit ashru ke katre bahakar
Sambandho se apne sab bandhan chudakar
Baandh tan ko kuch haath lambi cheer mein
Doobkar swajan kshanik vichoh peer mein
Tan tera karke hawan ko samarpit
Kuch paramparagat shradha suman karke arpit
Dheere – dheere chavi tak teri bhul jayenge
Kaal ka easa bhi ek divas aayega
aatmeeya bhi naam tak tera bhool jaayenge
 
Saath kewal karm honge, maya na hogi
Sambandhi kya sang apni chaaya na hogi
Bas pratikriyaen jag ki  tere saath hongi
Nagn hogi aatma, sang kaya na hogi
Fir rishton ke saagar mein maanav khota kyon hai
Apni – parai bhawana liye rota kyon hai
Jab ek na ek din tujhko chalana hai
Jo aaj udit surya hai , kal dhalna hai
 
All right reserved @Kavi Deepak Sharma

मैं बिखर रहा हूँ मेरे दोस्त संभालो मुझको ………Kavi Deepak Sharma

अप्रैल 26, 2009
Kavi Deepak Sharma
मैं बिखर रहा हूँ मेरे दोस्त संभालो मुझको ,
मोतिओं से कहीं सागर की रेत न बन जाऊँ
कहीं यह ज़माना न उडा दे धूल की मानिंद
ठोकरें कर दें मजरूह और खून मे सन जाऊँ .

इससे पहले कि दुनिया कर दे मुझे मुझ से जुदा
चले आओ जहाँ भी हो तुम्हे मोहब्बत का वास्ता
मैं बैचैनियो को बहलाकर कर रहा हूँ इन्तिज़ार
तन्हाइयां बेकरार निगाहों से देखती हैं रास्ता .

बहुत शातिराना तरीके से लोग बात करते हैं ,
बेहद तल्ख़ अंदाज़ से ज़हान देता है आवाज़
मुझे अंजाम अपने मुस्तकबिल का नहीं मालूम
कफस मे बंद परिंदे कि भला क्या हो परवाज़ .

अपनी हथेलियों से छूकर मेरी तपती पेशानी को
रेशम सी नमी दे दो , बसंत की फुहारे दे दो
प्यार से देख कर मुझको पुकार कर मेरा नाम
इस बीरान दुनिया मे फिर मदमस्त बहारें दे दो .

आ जाओ इससे पहले कि चिराग बुझ जायें
दामन उम्मीद का कहीं ज़िन्दगी छोड़ न दे ,
सांस जो चलती हैं थाम कर हसरत का हाथ
“दीपक” का साथ कहीं रौशनी छोड़ ना दे .

@कवि दीपक शर्मा
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जो रोज़ चलती रही जि़स्म पर गोलियाँ…………….Kavi Deepak Sharma

अप्रैल 26, 2009

जो रोज़ चलती रही जि़स्म पर गोलियाँ
और  मनती रही  खून  की  होलियाँ
तो एक दिन हकीकत हम  भूल जायेंगे
होली और दिवाली   से  भी घबराएँगे ।

हो न पायेगी पहचान रंग और खून में
जो पानी – सा लहू यूं ही बहता रहा
अपनी परछाई भी खौफ देगी एक दिन
अगर दौर कत्ल का यूँ ही चलता रहा ।
जो छूटते  रहे उपद्रवी स्वार्थ पर
फ़र्ज़ लगता रहा स्नेह के दाँव पर
तो और कुछ तो अंजाम होगा नही
बस शवों के कफ़न कम पड़ जायेंगे

अब बातों से कुछ भी न हो पायेगा
न बुझे दीपो की ज्योति लौट पाएगी
तुम कहोगे शान्ति गर बारूद के शोर में
तो ज़र्रों में शान्ति ख़ुद बिखर जायेगी
अरे ! उग्रवाद के कदम रोको ज़रा जोर से 
नहीं तो ख़ुद ही के कदम थर्रा जायेंगे
नासूर नश्तर के हाथों मिटा तो ठीक
वरना हिस्से जि़स्म से अलग हो जायेंगे ।
@कवि दीपक शर्मा,

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( उपरोक्त कविता काव्य संकलन मंज़र से ली गई है )

चलो महबूब चलो उस दुनिया की जानिब ………….Kavi Deepak Sharma

अप्रैल 26, 2009

मेरे जेहन में कई बार ये ख्याल आया
की ख्वाब के रंग से तेरी सूरत संवारूँ
इश्क में पुरा डुबो दूँ तेरा हसीन पैकर
हुस्न तेरा निखारू और ज्यादा निखारूँ ।

जुल्फ उलझाऊँ कभी तेरी जुल्फ सुलझाऊँ
कभी सिर रखकर दामन में तेरे सो जाऊँ
कभी तेरे गले लगकर बहा दूँ गम अपने
कभी सीने से लिपटकर कहीं खो जाऊँ
कभी तेरी नज़र में उतारूँ मैं ख़ुद को
कभी अपनी नज़र में तेरा चेहरा उतारूँ।
इश्क में पूरा डुबो दूँ तेरा हसीन पैकर
हुस्न तेरा निखारू और ज्यादा निखारूँ ॥

अपने हाथों में तेरा हाथ लिए चलता रहूँ
सुनसान राहों पर, बेमंजिल और बेखबर
भूलकर गम सभी, दर्द तमाम, रंज सभी
डूबा तसव्वुर में बेपरवाह और बेफिक्र
बस तेरा साथ रहे और सफर चलता रहे
सूरज उगता रहे और चाँद निकलता रहे
तेरी साँसों में सिमटकर मेरी सुबह निकले
तेरे साए से लिपटकर मैं रात गुजारूँ
इश्क में पुरा डुबो दूँ हँसीन पैकर
हुस्न तेरा निखारूँ और ज्यादा निखारूँ ॥

मगर ये इक तसव्वुर है मेरी जान – जिगर
महज एक ख्वाब और ज्यादा कुछ भी नहीं
हकीकत इतनी तल्ख है की क्या बयाँ करूँ
मेरे पास कहने तलक को अल्फाज़ नहीं ।
कहीं पर दुनिया दिलों को नहीं मिलने देती
कहीं पर दरम्यान आती है कौम की बात
कहीं पर अंगुलियाँ उठाते हैं जग के सरमाये
कहीं पर गैर तो कहीं अपने माँ- बाप ॥

कहीं दुनिया अपने ही रंग दिखाती है
कहीं पर सिक्के बढ़ाते हैं और ज्यादा दूरी
कहीं मिलने नहीं देता है और ज़ोर रुतबे का
कहीं दम तोड़ देती है बेबस मजबूरी ॥
अगर इस ख़्वाब का दुनिया को पता चल जाए
ख़्वाब में भी तुझे ये दिल से न मिलने देगी
कदम से कदम मिलकर चलना तो क़यामत
तुझे क़दमों के निशान पे भी न चलने देगी ।

चलो महबूब चलो उस दुनिया की जानिब चलें
जहाँ न दिन निकलता हो न रात ढलती हो
जहाँ पर ख्वाब हकीकत में बदलते हों
जहाँ पर सोच इंसान की न जहर उगलती हो ।।

(उपरोक्त नज़्म काव्य संकलन मंज़र से ली गई है )
@Kavi Deepak Sharma
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