Archive for the ‘Uncategorized’ Category

मैं जिस तरह तोडा गया साजिश दुनिया की लगती है @ Deepak Sharma

अप्रैल 1, 2019

मैं जिस तरह तोडा गया साजिश दुनिया की लगती है
ज्यों अपना कर छोड़ा गया साजिश दुनिया की लगती है

सागर की मानिंद हमने भी बंदिश में रहना सीखा नहीं
जैसे लहरों को मोड़ा गया साजिश दुनिया के लगती है .

मज़रूह दिल लेकर हँसते रहे उफ़ तक न सुनी जग ने मेरी ,
पर जैसे नासूर फोड़ा गया साजिश दुनिया की लगती है .

सूरज भी वही,चन्दा भी वही,कोई ग्रहण नहीं देखा फिर भी
धरती पे नूर थोडा गया साजिश दुनिया की लगती है .

हमने “दीपक” कई टूटे दर्पण फिर से जीते देखे रिश्ते
जैसे इस दफा जोड़ा गया साजिश दुनिया की लगती है .
@ Kavi Deepak Sharma
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तबाही का ‘दीपक’ को क्यों इल्ज़ाम देता है@Deepak Sharma

अप्रैल 1, 2019

क्यूँ अपनी बेवफ़ाई को वफ़ा का नाम देता है।
तुझे सारा जहां ग़द्दार मियाँ गुलफ़ाम कहता है।।

बात तो सच है लेकिन तुझे नागवार गुजरेगी।
साँप तक देख तेरी फ़ितरत साँप का नाम देता है।।

हवस में अपनी हस्ती तूने जब खुद जलाई तो।
तबाही का ‘दीपक’ को क्यों इल्ज़ाम देता है।।
@ दीपक शर्मा
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जब भी कोई बात डंके पे कही जाती है@ दीपक शर्मा

अप्रैल 1, 2019

जब भी कोई बात डंके पे कही जाती है।
ना जाने क्यों ज़माने को अख़र जाती है।।

झूठ कहते हैं तो मुज़रिम करार देते हैं।
सच कहते हैं तो बगावत की बू आती है।।

फ़र्क कुछ नहीं है अमीरी और ग़रीबी में ।
ग़रीबी रोती है , अमीरी छटपटाती है.।।

अम्मा ! मुझे चाँद नही एक रोटी चाहिऐ।
बिटिया ग़रीब की रह-रह के बुदबुदाती है।।

उधर सो गई फुटपाथ पर थककर मेहनत।
इधर नींद की खातिर हवेली कसमसाती है।।

बता हर वक़्त क्यों आँख से आँसू रिसते हैं।
क्या उसकी बहुत ‘दीपक’ तुझे याद आती है।।

@दीपक शर्मा
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Kavi

वीरों ने अपना खून बहाकर नीव रखी आज़ादी की।

मार्च 23, 2019

वीरों ने अपना खून बहाकर नीव रखी आज़ादी की।
हमने उस कुरबानी की अब लगता है बरबादी की।।

देश को खुल्लमखुल्ला देखो खुली चुनौती देते हैं।
बाँट रही है हमें सियासत पहन पोशाकें खादी की।।

बना शगूफा वंदेमातरम, जन गण मन पर शोर शराबा।
मुल्क़ से ऊपर रखते मज़हब, पैरवी आंतकवादी की ।।

राजगुरू,सुखदेव विसराये,भगत सिंह इतिहास हुऐ।
रुतबेदार बन गये लफंगे इज़्ज़त करें आंतकवादी की।

हिन्द की ख़ातिर चूमा फन्दा,सतलुज के मुहाने पर ।
मौत बना ली अपनी दुल्हन,खुद पहन के फंदा शादी की।

“दीपक” इससे बुरा वक्त क्या हिन्दुस्तान क्या देखेगा।
राम कृष्ण की जन्मस्थली को ही कहते ज़मीं गाज़ी की।।
@दीपक शर्मा

मैं न हिंदू हूँ ,न सिक्ख हूँ, न तो मुसलमान हूँ—–Kavi Deepak Sharma

मार्च 19, 2019

मैं न हिंदू हूँ ,न सिक्ख हूँ, न तो मुसलमान हूँ।
कोई मजहब नहीं मेरा, फ़क़त एक इन्सान हूँ।

मुझे क्यूँ बांटते हो क़ौमों में, ज़ुबानों में।
मैं सिर से पावँ तलक सिर्फ़ हिंदुस्तान हूँ।।

वक़्त की निगहबानी में दुनिया पला करती है।
तू भी मेहमान है और मैं भी एक मेहमान हूँ।।

तेरी नज़र में राह का मैं एक दरख़्त सही।
मगर न जाने कई परिंदों का घर मकान हूँ ।

ज़म्हुरिअत अदना को बादशाह बना देती है।
ज़र्रा भी चीख़ कर कहता है मैं आसमान हूँ ।।

पहले वतन पे रख ईमान फिर ये दावा करना।
मैं एक हिन्दू हूँ , सिख हूँ,या मुसलमान हूँ।।

जला जो मंदिर में तो आरती हो गया “दीपक”
बला मज्जिद में तो बोला कि मैं अजान हूँ।
@ दीपक शर्मा
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मैं न हिंदू हूँ ,न सिक्ख हूँ, न तो मुसलमान हूँ।

Mother’s Day…………By Kavi Deepak Sharma

मई 10, 2009

आओ ! सब मिलकर अपनी जननी के पुनः चरण स्पर्श करें और प्रभू से विनती करें कि हे !परम पिता हमे हर जन्म मे इसी माँ कि कोख से पैदा करना ..हमारा जीवन इसी गोद मे सार्थक हैं. हमारा बचपन इसी ममता का प्यासा हैं और जन्मो -जन्मान्तर तक हम इसी ममत्व का नेह्पान करते रहें ..माँ आप हमारा प्रणाम स्वीकार करो और हमे आशीर्वाद दो .
“उसकी आवाज़ बता देती हैं मैं कहाँ हूँ ग़लत
मेरी माँ के समझाने की कुछ अदा निराली है .”
copy right @ कवि दीपक शर्मा
Kavi Deepak Sharma
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इसका असली हक़दार तो केवल मजदूर है……कवि दीपक शर्मा

मई 3, 2009

गगन को चूमते ऊंचे मकान वालों सुनो
बहुत दिलकश , मुन्नकश ऐवान वालों सुनो
तुम्हें क्यों अपनी इमारत पे गुरुर है
इसका असली मालिक तो केवल मजदूर है

इनकी हकदार रोते बच्चों की निगाहें है
इनकी हक़दार पत्थर तोड़ती बेबस माँऐं हैं
इनके हक़दार घायल हाथ , ज़ख्मी पाँव हैं
इनके हक़दार तो बहते- रिसते घाव हैं
तन तुम्हारा तो ऐसी चोटों से दूर है
इसका असली हक़दार तो केवल मजदूर है

कितने मजदूरों ने छोड़कर बीमार बच्चों को
सूरत इन महलों की अपने हाथों से संवारी है
दबा कर भूख के शोले एक लोटा पानी से
इनके दरवाजों पर लाजवाब नक्काशी उभारी है
तुने तो सिक्कों की रौशनी फेंकी पसीने पर
मगर मजदूर की मेहनत ने तराशा कोहिनूर है

चमकते फर्श पर तुम जो खड़े हो इतराये से
कई हाथों ने इसे प्यार से सहलाया है
हर टुकडा लगाया है बहुत करीने से
बड़े सलीके से दुल्हन – सा इसे सजाया है
आज उनको ही नहीं इजाजत दहलीज़ चड़ने की
जिनके हुनर की बदौलत ड्योढी तेरी नूर है
@कवि दीपक शर्मा
Nazm taken from his Collection”Manzar”
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चैन-ओ-अमन से जीना ईद के मायने ………….Kavi Deepak Sharma

अप्रैल 26, 2009

Kavi Deepak Sharmaदिल में जब तक मैं-तू नहीं हम हैं
घर बिखरने के मौके बहुत कम हैं .

कौन खींचेगा भला सेहन में दीवार
प्यार जिंदा हो तो फिर कैसा गम है .

जिस्म की छोडिये बिकने लगी औलादे
तरक्की की राह में यह कैसा ख़म है .

खामियां आज उसकी खूबियाँ हो गई
जेब चाक़ थीं पहले अब खूब दम है .

कतरने चन्द बन गईं औरत का लिबास
तहजीब शर्मिंदा है,शर्म के घर मातम है .

ज़ख्म फिर से सभी जवान होने लगे
बता चारागर तेरा ये कैसा मरहम हैं .

माँ की हंसी संग देखा एक हँसता बच्चा
वाह अल्लाह कितनी सुरीली सरगम हैं .

खेलिए वक़्त से मत खेलने दीजिये इसे
वक़्त का खेल दोस्त बहुत बे- रहम हैं .

चैन-ओ-अमन से जीना ईद के मायने
ज़िन्दगी रोकर बसर करना मोहर्रम है.

हाथ फेला के संवारेगा वतन का मुक्कदर
उनको यकीन है पर हमें उम्मीद कम है.

राम ही जाने अब सफ़र का अंजाम “दीपक”
टूटती साँसे रहनुमा की और तबियत नम है .
@Kavi Deepak Sharma
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काफिर के साथ खा गया जो मुसलमान था …………..KAVI DEEPAK SHARMA

अप्रैल 26, 2009

Kavi Deepak Sharmaजिस पर मुझे ज़रूरत से ज्यादा गुमान था
दिल उस शख्स का बहुत बेईमान था

बिखरा हुआ पड़ा था एक साया उसके पास
कोई अजनबी नही वो मेरा अरमान था

कहकहों में बज्म के दब गई सिसकी मेरी
मामूली थी हस्ती मेरी,बहुत छोटा निशान था

खुश था जिसे में फूंक कर मज़हबी जुनून में
बाद में मालूम हुआ वो मेरा मकान था

दोस्तों ने दोस्ती निभाई भी तो किस जगह
बस ज़िन्दगी से चार कदम शमशान था

भूख का कहीं कोई मज़हब ‘ दीपक’ होता नही
काफिर के साथ खा गया जो मुसलमान था ।

( उपरोक्त ग़ज़ल काव्य संकलन मंज़र से ली गई है )

@Kavi Deepak Sharma
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सबका भला कर, प्रभु सबका भला कर……………Kavi Deepak Sharma

अप्रैल 26, 2009
एक साठ वर्षीय नेत्रहीन व्यक्ति,
जो शायद रास्ता भूल गया था,
एक सुनसान सड़क पर अकेला चला जा रहा था ।
राह में खड़ी एक दीवार पर छड़ी लगाकर बोला
क्या आस-पास कोई है?
पास में उपस्थित नारी ने कहा- बाबा कहाँ जाना है?
नेत्रहीन बोला- बेटी गली नम्बर सात का रास्ता बता दो,
अगर हो सके तो मोड़ तक ही पहुँचा दो।
तभी पास की मस्जिद पे खड़े व्यक्ति की
इस वाकिये पे पैनी नजर पड़ी
वह व्यक्ति चिल्लाया – काफिर मुस्लिम लड़की छेड़ता है
अकेला देखकर रास्ता रोकता है।
बस ज़रा से देर में सड़कें खून से लाल थीं,
शहर में देखते ही गोली मरने के आदेश थे।
क्योंकि शहर में मज़हबी तूफान उठ चुका था,
भावनाओं का कौम से गला घुट चुका था।
मन्दिर तोड़े जा रहे थे, मस्जिदें उखाड़ी जा रही थीं,
इंसानों द्वारा इंसान की शक्लें बिगाड़ी जा रहीं थीं।
दोनों धर्मों की अलग- अलग सभाएं हो रहीं थी
किसको मरना है की चालें नियोजित हो रहीं थी
उस नेता का घर तो दौलत से तालाब हो गया था
पर लथपथ लाशों को गिनना बेहिसाब हो गया था।

हर तरफ से जख्मियों की कराह आ रही थी,
उनमें से उस नेत्रहीन की भी सदा आ रही थी,
वह दुआ थी, शिकायत थी, या शुक्रिया था
शोर में ये तो समझ नहीं आ रहा था
पर बार- बार वो यही कहे जा रहा था।
अच्छा हुआ भगवान जो तूने मुझे आँखें नहीं दी,
इससे अच्छा तो ये होता की कान भी न देता,
ताकि मैं, भावनाओं की कराहें तो न सुन पाता
बेवजह मरने वालों की आहें तो न सुन पाता
अंत में दोनों हाथों को मिलाकर, वो बोला चिल्लाकर
सबका भला कर, प्रभु सबका भला कर।

@Kavi Deepak  Sharma